श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में करीब तीन साल चली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की गठबंधन सरकार आखिर गिर गई। वैसे इस गठजोड़ पर शुरू से ही दोनों दलों के नीतिगत मामलों पर वैचारिक मतभेद हावी रहे। कई बार गठबंधन सरकार टूटने के कगार पर पहुंची और बच गई। एक नजर उन मुद्दों पर जिन पर मेहबूबा की पार्टी और भाजपा में कभी एक राय नहीं बन सकी और आखिरकार गठबंधन टूट गया –

1. राज्य ध्वज पर दोनों पार्टियां हुई थी आमने-सामने – जम्मू कश्मीर का अपना ध्वज है। पीडीपी चाहती थी कि सभी संवैधानिक संस्थानों और संवैधानिक पदों पर आसीन लोग राज्य ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज की तरह ही सम्मान दें। इस संदर्भ में मार्च 2015 में आदेश जारी हो गया, लेकिन भाजपा के विरोध के चलते आदेश को वापस लिया गया।

2. बीफ बैन और गौ रक्षक मुद्दे पर कई बार गर्माए – राज्य में गौवंश की हत्या के खिलाफ कानून के अनुपालन पर दोनों दलों के सियासी हित टकराए और रियासत में एक तरह से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा हो गई। राज्य विधानसभा के भीतर भी सदस्यों में आपस में मारपीट की नौबत पहुंच गई थी, लेकिन किसी तरह यह मामला शांत हुआ।

3. पनबिजली परियोजनाएं – पीडीपी चाहती थी कि केंद्र जल्द राज्य में एनएचपीसी द्वारा संचालित दो पनबिजली परियोजनाओं को सरकार के हवाले करे। वह अन्य परियाजनाओं में राज्य के लिए बिजली की रायल्टी को 12 से बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक कराना चाहती थी। इस पर मामला आगे नहीं बढ़ रहा था।

4. धारा 370 और 35ए पर भी कई बार हुए टकराव – धारा 35ए और 370 पर भी पीडीपी और भाजपा में मतभेद रहे हैं। भाजपा दोनों धाराओं को हटाने का नारा देती है, जबकि पीडीपी इसके उलट थी। बीते साल 35ए को लेकर स्थिति भाजपा से संबंधित संगठन ने इसे भंग करने के लिए याचिका दायर की। कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस ने इसे मुद्दा बना लिया और पीडीपी भी कांग्रेस व नेकां के साथ खड़ी रही। यह मामला अदालत में विचाराधीन है।

5. गुज्जर-बक्करवाल समुदाय हित पर भी अड़े – गुज्जर-बक्करवाल समुदाय जम्मू संभाग में बड़ा वोट बैंक है। जनवरी में महबूबा के नेतृत्व में हुई बैठक में हिदायत दी गई कि समुदाय अगर किसी जमीन पर बैठा है तो नहीं हटाया जाए। भाजपा कहती रही कि मिनट्स में छेड़खानी हुई है, लेकिन आला कमान के आग्रह पर प्रदेश भाजपा ने कुछ समय बाद चुप्पी साध ली।

6. रोहिंग्याओं पर चली सियासत – रोहिंग्या शरणार्थियों को राज्य की शांति और कानून व्यवस्था के लिए खतरा बताए जाने के बावजूद पीडीपी ने इन लोगों को राज्य से बाहर करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। जम्मू संभाग में लोग इस मुद्दे पर आंदोलनरत रहे, लेकिन कश्मीर में अलगाववादियों और नेकां व अन्य दलों द्वारा शुरू की गई सियासत और मुस्लिम कार्ड खेले जाने पर पीडीपी ने रोहिंग्या के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया।

7. राज्य मंत्रिमंडल विस्तार ने भी तल्खियां बढ़ाईं – अप्रैल के अंत में मंत्रिमंडल फेरबदल ने भी दोनों दलों के बीच तल्खियां बढ़ाई। भाजपा ने पीडीपी के दबाव के आगे झ़ुकते हुए गठबंधन को बनाए रखने के लिए दो मंत्रियों चंद्रप्रकाश गंगा और चौधरी लाल सिंह से इस्तीफा ले लिया था, लेकिन राजीव जसरोटिया को मंत्री बनवाया। पीडीपी के अंदर जबरदस्त गुस्सा था, क्योंकि राजीव भी कठुआ कांड में कथित आरोपितों के पक्ष में हुई रैलियों में शामिल रहे थे। पीडीपी को कश्मीर में नेकां व अन्य दलों के सवालों का जवाब देते नहीं बन रहा था।

8. पाक व अलगाववादियों से बातचीत पर भी तनातनी – पीडीपी चाहती थी कि पाक और अलगाववादी खेमे से बातचीत की प्रक्रिया शुरू हो। केंद्र और प्रदेश भाजपा खिलाफ थी। भाजपा ने कहा कि अलगाववादियों से बातचीत संविधान के दायरे में होगी। बातचीत तभी होगी जब आतंकवाद को बंद करे।

9. सीजफायर पर भी नाराजगी – रमजान संघर्ष विराम जिसका फैसला केंद्र ने प्रदेश भाजपा की नाराजगी के बावजूद महबूबा के कहने पर लिया था, पूरी तरह नाकाम रहा। महबूबा कश्मीर में विभिन्न वर्गों के साथ संवाद बनाने, जनता तक पहुंच बनाने में नाकाम रहीं और उल्टा आतंकी हिंसा में बढ़ोतरी हुई। गृहमंत्रालय ने इसे ईद के संपन्न होते समाप्त कर दिया। पीडीपी निराश थी, वह चाहती थी कि इसे कुछ और समय के लिए विस्तार दिया जाए।

10. पत्थरबाजों पर नरम रवैया – पत्थरबाजों के मुद्दे पर भी दोनों दल एकमत नहीं थे। पीडीपी नरम रवैया अपनाने की वकालत करती है, वहीं भाजपा विरोध में थी। पूर्व मंत्री चंद्र प्रकाश गंगा ने पत्थरबाजों को गोली मारने की बात की थी। बीते साल जब पीडीपी ने पत्थरबाजों के खिलाफ मामले वापस लेने का एलान किया तो प्रदेश भाजपा असहमत थी।