शनिवार से चीन के शहर चिंगदाओ में शुरू हो रही शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शीर्ष नेताओं की बैठक भारतीय कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने जा रही है। हाल के दिनों में जिस तरह से भारत ने चीन और रूस के साथ अपने रिश्तों में नई गर्मजोशी भरी है उसे देखते हुए एससीओ की बैठक की अहमियत बढ़ गई है। चीन, रूस, पाकिस्तान व भारत समेत आठ देशों की इस बैठक में हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक)महासागर से जुड़े मुद्दे केंद्र में होंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार सुबह चिंगदाओ पहुंच रहे हैं। वहां एससीओ बैठक में हिस्सा लेने के अलावा मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग व रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात तय है। इन दोनों नेताओं के साथ मोदी की एक महीने के भीतर दूसरी मुलाकात होगी। यह भारत की बदली कूटनीतिक सोच की तरफ भी इशारा करता है। भारत स्पष्ट तौर पर इंडो-पैसिफिक मुद्दे पर अपने सारे विकल्प खुले रखना चाहता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सिंगापुर में शांग्रीला डायलॉग में हिंद-प्रशांत सागर क्षेत्र में टकराव दूर करने के लिए जो फॉर्मूला दिया है उसकी तारीफ चीन में भी हो रही है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने स्वयं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मोदी के भाषण की तारीफ की है। ऐसे में एससीओ बैठक में हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर कोई बड़ी घोषणा हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।

क्या सार्क की जगह लेगा एससीओ

चीन जिस तरह एससीओ को व्यापक बनाने में जुटा हुआ है उसे देखते हुए कूटनीतिक सर्किल में यह चर्चा की जा रही है कि क्या आने वाले दिनों में एससीओ दक्षिण एशियाई देशों के सहयोग संगठन “सार्क” का स्थान लेगा? हालांकि इसकी संभावना को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने खारिज किया है, लेकिन एससीओ की भावी योजना को देखें तो तस्वीर साफ होती है। मसलन, इस वर्ष नेपाल और श्रीलंका को एक पर्यवेक्षक के तौर पर शामिल किया गया है। दोनों देश इसमें शामिल होने को तैयार हैं। बांग्लादेश व अफगानिस्तान का नंबर इसके बाद आएगा। जबकि ईरान को बतौर पूर्ण सदस्य शामिल करने की तैयारी है।

भारत को भी पिछले वर्ष ही पाकिस्तान के साथ इस संगठन का पूर्णकालिक सदस्य बनाया गया है। इसमें शामिल केंद्रीय एशिया के चारों देश (किर्गिगस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान व ताजिकिस्तान) को भारत अहम कारोबारी साझेदार देशों के तौर पर देख रहा है। भारत इन चारों देशों को कनेक्टिविटी परियोजना से जोड़ने की योजना बना रहा है।

पीएम मोदी का एजेंडा

विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी निश्चित तौर पर एससीओ में भारत का एजेंडा पेश करेंगे। मोदी की कोशिश होगी कि आतंकवाद के मुद्दे पर यह संगठन बेहद सख्त बयान दे। चूंकि बैठक में पाकिस्तान भी होगा इसलिए भारत के लिए आतंकवाद का मुद्दा ज्यादा अहम होगा। प्रधानमंत्री मोदी का दूसरा अहम एजेंडा अंतरराष्ट्रीय स्तर की कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर आमराय विकसित करना होगा।

अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत की बैठक-इंडो पैसिफिक क्षेत्र के हालात पर हुई चर्चा

हिंद-प्रशांत महासागर का मुद्दा वैश्विक राजनीतिक में जिस तरह से महत्वपूर्ण बनता जा रहा है उसे देखते हुए भारत भी अपने हर विकल्प को खोल कर रखना चाहता है। यही वजह है कि एक तरफ जहां वह चीन के साथ अपने रिश्ते को सुधारने में जुटा है वहीं इस क्षेत्र में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ चार देशों के गठबंधन को लेकर भी धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा है। गुरुवार को विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की उक्त तीनों देशों के साथ एक अहम बैठक सिंगापुर में हुई। चारों देशों के बीच बने इस नए गठबंधन की पहली बैठक पिछले वर्ष हुई थी। इसे चीन के खिलाफ चार लोकतांत्रिक देशों के एकजुट होने के तौर पर भी देखा जाता रहा है।

विदेश मंत्रालय की तरफ से दी गई सूचना के मुताबिक, चारों देशों ने पूरे हिंद व प्रशांत क्षेत्र को संपन्न, आजाद व सभी के लिए एक समान अवसर देने वाले क्षेत्र के तौर पर विकसित करने की मंशा पर जोर दिया। साथ ही इन देशों ने इस क्षेत्र को कानून सम्मत बनाने की भी घोषणा की जो पहले भी की जाती रही है। यह चीन की तरफ संकेत होता है कि वह दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय नियम का पालन करे।

गुरुवार की बैठक में एक खास बात यह रही है कि इसमें आसियान क्षेत्र को लेकर खास तौर पर चर्चा की गई। चारों देशों ने कहा है कि हिंद प्रशांत क्षेत्र में आसियान देशों की अगुवाई में ही कोई व्यवस्था होनी चाहिए। यह चीन की तरफ एक इशारा है कि वह इस क्षेत्र में कोई विस्तारवादी कदम न उठाए। चारों देशों ने कहा है कि वे इस क्षेत्र के दूसरे देशों के साथ काम करने को तैयार है ताकि शांति व संपन्नता को बढ़ावा दिया जा सके।