मुख्यमंत्रीजी, लाडली खफा हैं! ग्राफ आया नीचे

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इंदौर। शिवराज मामा के वादों पर भरोसा कर मुस्कराने वाली प्रदेशभर की लाडलियां अब खफा होने लगी हैं। लाडली लक्ष्मी योजना जिस सोच और जोश के साथ शुरू की गई थी, अब वह अर्थ खोने लगी है। संख्या बढ़ाने के लिए लाडलियों के रजिस्ट्रेशन तो खूब हो रहे हैं, लेकिन विभागीय वेबसाइट के अनुसार आगे योजना का लाभ मुश्किल से 45% को ही मिल पा रहा है।
वहीं अफसरों का दावा है कि योजना के तहत बच्चों के लिए सारी 580 करोड़ की राशि शासन ने जारी की है। एनएससी वितरण में देरी की बात वे भी स्वीकार रहे हैं। हां, यह वादा जरूर कर रहे हैं कि जल्दी ही सबको पूरा लाभ मिलेगा। कैसे? पता नहीं।
साउथ तोड़ा निवासी इरफान तीन साल की बेटी आसीन का दूसरा राष्ट्रीय बचत पत्र (एनएससी) लेने के लिए लगातार आंगनवाड़ी के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन कोई जवाब नहीं मिल रहा। उनकी बेटी को 2008 में लाडली लक्ष्मी योजना के तहत पहली एनएससी जारी की गई थी। इसी तरह राजू और परवीन भी बच्ची सेजा की दूसरी एनएससी के लिए आंगनवाड़ी व विभाग के चक्कर लगा रहे हैं। ऐसे कई केस हैं। (नाम व पते वास्तविक हैं)
‘लाडली’ को लखपति बनाना भले ही मुख्यमंत्री के लिए महत्वाकांक्षी योजना हो लेकिन अफसर कुर्सी से हिल नहीं रहे हैं। पांच साल पहले शुरू की गई योजना की हालत आज यह है कि बच्चियों को एनएससी की दूसरी और तीसरी किस्त मिली ही नहीं है।
यह है हाल
– विभाग की वेबसाइट के अनुसार प्रदेश में 2010 तक पहला एनएससी चार लाख 24 हजार 110 बालिकाओं को जारी किया गया।
– दूसरा एनएससी सिर्फ एक लाख 93 हजार 201 बालिकाओं को अर्थात लगभग 45% को ही मिला है।
यूं दिया जाता है टारगेट
एक हजार की आबादी पर 36 बच्चों का जन्म माना जाता है। इनमें से यदि 50 फीसदी यानी 18 लड़कियां हो तो भी पांच या छह पहली बेटी और छह दूसरी बेटी मानी जाती हैं। योजना के मापदंडों के अनुसार आठ या नौ लड़कियों को योजना का लाभ मिल सकता है। इनमें से औसतन तीन लोग परिवार नियोजन का स्थाई साधन अपनाते हैं। ऐसे में एक हजार पर बमुश्किल तीन लड़कियों का योजना का लाभ दिया जा सकता है।
लक्ष्य पूरा करने में माहिर
हर साल की तरह महिला एवं बाल विकास विभाग का अमला टारगेट पूरा करने में लगा है। कुछ जिलों ने दिसंबर में ही सालाना टारगेट हासिल कर अचरज में डाल दिया लेकिन बचे बचत पत्र जारी करने में वे भी फिसड्डी रहे। इंदौर जिले को इस साल साढ़े बारह हजार का लक्ष्य मिला है। इसमें से लगभग 10 हजार का लक्ष्य पूरा हो चुका है।
ये शर्तें
-माता-पिता क्षेत्र के आंगनवाड़ी केंद्र में आवेदन जमा करवा सकते है। पंजीयन के लिए जरूरी है कि माता-पिता मप्र के मूल निवासी हो और आयकरदाता न हो।
-प्रथम बालिका के पंजीयन पर दूसरे प्रसव के बाद परिवार नियोजन अपनाना अनिवार्य।
-यदि जन्म के समय कोई पंजीयन नहीं करवा पाता है तो बच्ची के जन्म से दो साल के भीतर कलेक्टर कार्यालय में आवेदन देकर योजना का लाभ ले सकता है।
-इसके अलावा माता-पिता की मृत्यु की स्थिति में बच्ची की उम्र के पांच साल तक आवेदन के अधिकार दिए गए है।
यह है योजना
– बालिकाओं की शिक्षा व स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए प्रदेश सरकार ने 2006 से लाडली लक्ष्मी योजना की शुरुआत की, जिम्मा सौंपा महिला एवं बाल विकास विभाग को।
– योजना के तहत छह-छह हजार रुपए के राष्ट्रीय बचत पत्र शासन द्वारा पांच बार बच्ची के नाम पर क्रय किए जाना है जो बालिका को 21 की उम्र में मिलना है। एकमुश्त बालिका को एक लाख 21 हजार रुपए मिलेंगे। बशर्ते विवाह 18 साल के पहले नहीं हुआ हो।
– इस बीच 9वीं में 4 हजार, 11वीं में प्रवेश पर साढ़े सात हजार और 12वीं में स्कॉलरशिप का भी प्रावधान है। राशि 18 से 21 साल के मध्य भी एकमुश्त मिल सकती है।
ऐसे हो रही है गड़बड़
– अभी तक प्रदेश में छह लाख से अधिक भांजियों को पंजीकृत किया जा चुका है लेकिन लगभग 55% को बाद के एनएससी नहीं मिले।
– ऐसी शिकायतें भी सामने आई हैं कि 3-4 बच्चों के मां-बाप ने नवजात को पहली बच्ची बताकर योजना का लाभ ले लिया।
एनएससी मिलने में देरी से ब्याज का भी नुकसान
समय पर एनएससी नहीं मिलने से बालिकाओं को उस पर ब्याज भी कम मिलेगा। उतनी अवधि की ब्याज राशि पोस्ट ऑफिस से कम होगी। ऐसे में लाडलियों को लखपति बनाने की मंशा कैसे पूरी होगी?

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