14 वर्षीय सरकार, संचालन में विलक्षण शिव-राज

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प्रदेश की भाजपा सरकार को पूरे 14 साल हो गए और बन गए कई ऐसे कीर्तिमान जो आगामी राजनीति में मील के पत्थर के रूप में जाने जाएंगे। साथ ही यह अविस्मरणीय रहेगा कि इन चौदह सालों में मुख्यमंत्री तो तीन-तीन बदले लेकिन सत्ता में भाजपा ही बनी रही। जैसा कि विदित ही है कि वर्ष 2003 में सुश्री उमा भारती ने भाजपा की स्टार प्रचारक के रूप में कांग्रेस की दिग्विजयी सरकार के खिलाफ हुंकार भरी और भारी जन समर्थन के साथ बाजी अपने पक्ष में कर ली। ये और बात है कि वे ज्यादा लम्बे समय तक सरकार पर कायम नही रह पाईं और सरकार से वंचित हुए दिग्विजय सिंह की सियासी शह की शिकार बन कर बड़ी भारी मात खा बैठीं। फलस्वरूप सत्ता बाबूलाल गौर के हिस्से में आ गई, लेकिन वो भी सत्ता का सुख ज्यादा समय तक नही उठा पाए। भाजपा के तीसरे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बने और आज तक बने हुए हैं। लेकिन काबिले गौर बात ये है कि चौदह बर्षीय भाजपाई शासन के दौरान 12 सालों तक प्रदेश के सिरमौर बने हुए शिवराज ने अनेक प्रतिकूलताओं के बीच जो राजनैतिक स्थायित्व का भाव आम आदमी को दिया, वह अविस्मरणीय है। वर्ना तीन-तीन मुख्यमंत्रियों के जल्दी-जल्दी बदलने से यह धारणा बनने लगी थी कि अंर्तकलह के चलते भाजपा शायद ही पांच साल तक प्रदेश की सरकार संभाल पाए। लेकिन चौहान ने पांच नही पूरे 12 सालों तक सरकार चला कर सभी को भौचक्का कर दिया। नतीजतन आज उनका नाम अनेय राष्ट्रीय नेताओं के समकक्ष लिया जाने लगा है। जहां तक शिवराज सरकार की कार्यप्रणाली का सवाल है तो कौन ये नही जानता कि अनेक ऐसे राज्य हैं जो गैर भाजपाई सरकारों द्वारा शासित होने के बावजूद भी मध्यप्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रहीं जनहित की योजनाओं को अपने यहां लागू करना चाहते हैं। फिर चाहे वो लाड़ली लक्ष्मी योजना हो या फिर कन्यादान योजना। इन योजनाओं की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गाहे बगाहे इन दोनों योजनाओं की तारीफ अपने भाषणों में ले लिया करते हैं। यही नही, शिवराज को उन बिरले मुख्यमंत्रियों में शुमार किया जाने लगा है जो लम्बे समय  तक लगातार एक प्रदेश के मुख्यमंत्री तो रहे ही, अपनी साख को भी बनाए रखने में कामयाब साबित हुए। हालांकि राजनीति काजल की कोठरी मानी जाती है तो यह भी दावा किया जाता है कि इस कोठरी में कोई खुद को कालिख लगने से बचा ही नही सकता। ऐसा शिवराज सरकार के साथ भी हुआ। डम्पर, व्यापम, भावांतर, जैसे विवादित मुद्दों ने कई बार सरकार की चूलें तक हिलाईं, लेकिन शिवराज किसी मंझे हुए राजनैतिक खिलाड़ी की तरह मैदान में डटे रहे और हर मुसीबत से बाहर आने में सफल साबित हुए। ये बात और है कि व्यापम का मामला अभी भी अदालत के जेरे नजर है। इसे शिवराज सिंह चौहान की सधी हुई कार्यप्रणाली का परिणाम ही कहा जाएगा कि इतने झंझावतों से जूझने के बाद भी वे अपनी पार्टी में निर्विवाद बने हुए हैं। उसी का परिणाम है कि आज जब बात मिशन 2018 की चलती है तो भाजपा आला कमान की ओर से स्पष्ट रूप से यह कह दिया जाता है कि मध्यप्रदेश में आगामी चुनाव शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। यह बात भी सही है कि बाबूलाल गौर, सरताज सिंह और राघवजी जैसे कुछ बुजुर्ग प्रादेशिक नेता शिवराज सरकार से नाराजगी बनाए हुए हैं। लेकिन ऐसे में भी संगठन शिवराज सिंह के पीछे मजबूती के साथ ही खड़ा नजर आता है तो उसका कारण यही है कि भाजपा के साथ-साथ आम आदमी का जो विश्वास उन्होंने अर्जित किया है वह करिश्मा किसी और भाजपा नेता में कम से कम मध्यप्रदेश में तो नजर नही आता। शायद यही वजह है कि जब गैर भाजपाई प्रतिस्पर्धियों की बात की जाती है तो कोई फिलहाल तो यह तय नही कर पा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में शिवराज से लोहा किसके नेतृत्व में लिया जाएगा। खासकर कांग्रेस में जहां चुनावी सरताज को लेकर विवाद है, वैसी हालत शिवराज सिंह चौहान के सामने कतई नही हैं। अत: सबकी नजर सामयिक पस्थितियों पर है, शायद कोई मुद्दा हाथ लग जाए, जिसके आधार पर शिवराज सरकार को घेरा जा सके। ऐसा भी नही है कि विपक्ष को अवसर मिले ही नही। प्याज खरीदी को लेकर किसान भारी आक्रोश के साथ सरकार के खिलाफ लामबंद नजर आए। यहां तक कि उन पर गोली चालन भी हुआ और ऐसा लगा कि अब बाजी भाजपा के हाथ से निकल कर कांग्रेस के पक्ष में जाने को ही है। लेकिन इस मामले में भी शिवराज सियासी बाजीगर साबित हुए और बड़ी ही साफगोई के साथ उन विपरीत हालातों से बाहर निकल आए। लिखने का आशय ये कि नि:संदेह समस्याएं पूरी तरह से खत्म नही हुई हैं, यह सरकार भी पूर्ववर्ती सरकारों से बहुत ज्यादा अलग नही है। लेकिन शिवराज सिंह की देखो और इंतजार करो की राजनीति ने इसे परेशानियों से सकुशल बाहर निकल जाने की महारत हासिल करा दी है। यही कारण है कि आगामी विधान सभा चुनाव एकदम नजदीक हैं, लेकिन शिवराज सिंह चौहान अभी भी आत्मविश्वास से भरे हुए नजर आ रहे हैं। इसे विलक्षणता नही तो और क्या कहें।

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